दिल्ली हाई कोर्ट ने रेप और ब्लैकमेलिंग के आरोपों में गिरफ्तार एक शादीशुदा जिम ट्रेनर को जमानत दे दी है। अदालत ने फैसले के दौरान टिप्पणी भी की। कहा कि किसी व्यक्ति की नैतिकता और अपराध को अलग-अलग नजरिये से देखना जरूरी है, खासकर तब जब मामला किसी की व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़ा हो।

जस्टिस गिरीश कठपालिया की बेंच ने कहा कि अदालत के सामने पेश की गई तस्वीरों और वीडियो से प्रथम दृष्टया यह प्रतीत होता है कि आरोपी और महिला अधिवक्ता के बीच संबंध सहमति से थे। बार एंड बेंच में छपी रिपोर्ट के अनुसार, कोर्ट ने यह भी साफ किया कि आरोपी का शादीशुदा होना या अलग धर्म से संबंध रखना जमानत से इनकार करने का आधार नहीं हो सकता। मामले में आरोपी की ओर से अधिवक्ता संजीव कुमार, कपिल खन्ना और आसिफ खान पेश हुए, जबकि पीड़िता की तरफ से अधिवक्ता संजीव सभरवाल ने पक्ष रखा।

जिम में हुई थी दोनों की मुलाकात

अभियोजन पक्ष के अनुसार महिला अधिवक्ता की मुलाकात आरोपी से दिल्ली के एक जिम में हुई थी। दोनों के बीच दोस्ती बढ़ी और बाद में संबंध बने। महिला का आरोप है कि आरोपी ने उसे नशीला पदार्थ मिलाकर ड्रिंक पिलाई, जिसके बाद वह बेहोश हो गई। इसके बाद आरोपी उसे गाजियाबाद के एक ओयो होटल में ले गया, जहां उसके साथ दुष्कर्म किया गया और बिना अनुमति तस्वीरें खींची गईं।

ब्लैकमेल कर रेप का आरोप

महिला ने आरोप लगाया कि बाद में आरोपी उन्हीं तस्वीरों के जरिए उसे ब्लैकमेल करता रहा और सोशल मीडिया पर फोटो वायरल करने की धमकी देकर कई बार शारीरिक संबंध बनाए। शिकायत में यह भी कहा गया कि आरोपी ने उससे 65 हजार रुपये भी वसूले।

आरोपी बोला- रिश्ता आपसी सहमति से था

वहीं आरोपी की ओर से अदालत में कहा गया कि महिला के साथ उसका रिश्ता पूरी तरह सहमति से था और जब दोनों के संबंध खराब हुए, तब यह शिकायत दर्ज कराई गई। आरोपी ने कोर्ट के सामने कुछ फोटो और वीडियो क्लिप भी पेश किए, जिनमें दोनों को करीबी रिश्ते में दिखाया गया।

कोर्ट की टिप्पणी

हाई कोर्ट ने कहा कि शिकायतकर्ता एक वयस्क और प्रैक्टिसिंग एडवोकेट हैं। जांच के दौरान आरोपी के मोबाइल फोन से कोई आपत्तिजनक फोटो या वीडियो भी बरामद नहीं हुए। अदालत ने कहा कि रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री पहली नजर में आरोपी के इस दावे का समर्थन करती है कि संबंध सहमति से थे। कोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष की यह दलील कि आरोपी शादीशुदा है और बच्चे का पिता होने के बावजूद विवाहेतर संबंध में था, जमानत देने से इनकार करने का आधार नहीं बन सकती। अदालत ने यह भी कहा कि धर्म का अंतर भी इस मामले में कोई आधार नहीं है।

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